शनिवार, 11 मई 2013

माँ:मेरी चिरागेज़िनी


    माँ : मेरी चिरागेज़िनी

जब नहीं होती है माँ,
तभी बहुत याद आती है माँ,
यूं तो हवा की तरह कब
साँसों में आती-जाती रहती थी?
कब पानी की तरह अपनी,
ममता से प्यास बुझाती रहती थी?
खाने की तरह कब हमारी
भूख मिटाती रहती थी?
कुछ पता ही नहीं चलता था,
उसका होना अपने वज़ूद से
इस कदर जुड़ा रहता था कि,
कभी अलगाव ही महसूस नहीं होता.
पर जब नहीं होती है माँ,
तभी बहुत याद आती है माँ...
आज नहीं होने पर
होता है महसूस कि माँ! तुम मेरे लिए चरागेज़िन थीं, जो मेरी ,
हर ज़रूरत को चुटकी में,
पूरा कर दिया करती थीं
कब कैसे नींद न आने पर,
थपकियों से सुला दिया करतीं थीं|
सपनों को मेरे साकार कर
आकार दिया करती थीं,
सच ही माँ !
तुम चिरागेज़िन हुआ करती थीं
             ..........मंजु महिमा     

शुक्रवार, 10 मई 2013

भावांजलि - मातृदिवस पर



           
 माँ

माँ ! आपको हम भुला ना पाएंगे कभी

प्यार का एक बड़ा सा महल चिना आपने,

ममता और पीड़ा से घड़ा है हमें आपने, 

अपनी आस्था और विश्वास की दीवारों में

दुनिया की निगाहों से सुरक्षित रखा आपने 

कर्तव्यों की वेदी पर ताज़ा धूप सी मुस्कान लिए ,

हमें रहना है हँसकर, सहना है हँसकर ,

मुसीबतों से निपटना  हँसकर, सिखाया है आपने |

विपत्तियों में  भी हमको हिम्मत का पाठ पढ़ाया,

संस्कारों, ज्ञान की संपत्ति से संपन्न बनाया आपने ,

आपने   हमें  धडकने दींसाँसे   दीं  कितनी,

इसका  नहीं कभी हिसाब लगाया आपने |

छोटी - बड़ी    अपनी   ढेर   सी   बातों  से 

रिश्ते   के  आँचल  को  और भी गाढा  बनाया आपने |

हमारा   वजूद   ओ’  ये    अक्स है आपका ही,

शत शत वंदन माँ ....शत शत वंदन....


माँ ! आपको हम भूल ना पाएंगे कभी .....- 


गुरुवार, 2 मई 2013

फ़ितरत


          फ़ितरत ?
मैंने पूछा,”मैं करूँ क्या?
कैसे जियूं इस संसार में?”
कहा पवन ने मुझसे,
”उलटी बहो, जैसे मैं बहती हूँ आजकल,
उड़ाकर ले जाओ सभी को,
यह बात और है कि
सब तहस-नहस हो जाएगा.”
तालाब ने कहा, “मेरी तरह दायरे में रहो,
हाँ, जल कुम्भियाँ,
ज़रूर तुम पर छाने की कोशिश करेंगी,
पर, कुछ पर्यावरण-प्रेमी आएँगे,
तुम्हें मुक्त करवाने का नाटक करेंगे,
पर, जल-कुम्भियों की जड़ें बहुत गहरी होती हैं,
ये फिर उग आएंगी, तुम्हें इनकी आदत हो जाएगी.”
नदी ने कहा, “धीमे बहो, जैसे हम
बह रही हैं, गन्दगी को दर किनार करके .”
सागर बोला, “ मेरी तरह बन जाओ,
हवा के साथ अपने में जोश लाओ,
खूब शोर करके, आगे बढ़ो
रौरव के साथ चट्टानों से भी टकराओ ,
यह बात और है कि
चिकनी-चट्टानों पर तुम्हारा असर नहीं होगा,
पर शायद कुछ गन्दगी साफ़ हो जाए.”
पेड़ ने कहा, “ मेरी तरह एक जगह खड़ी होकर,
तमाशा देखो,
जब काटने वाले आएँ तो,
हो सकता है बचाने वाले आएँ,
तुम्हें तख्ती पहनाने,
पर, कुछ समय बाद तुम
अपने को कटा हुआ पाओगी,
शायद शहीदों में नाम लिखा जाओगी.”
सोचा मैंने, क्या करूं?
एक नई दुनिया ही बसा डालूँ ?
दूसरे पल ख्याल आया,
पर वहाँ भी तो यही सब होंगे,
और यही फ़ितरत,
कैसे बदलेगी यह ????????
             ---------मंजु महिमा
(१३/२/२००१३)

रविवार, 21 अप्रैल 2013

कत्ल सूरज का -

                                                                   -क़त्ल सूरज का-


                                                   चलती हुईं सड़कें,

ठहरी हुई नदी,

चमकती इमारतें,

बुझी झोपड़ी ।

सूरज के कत्ल से


लाल आसमां,

अवनि के माथे पर,


शुक्र के तारे की

टिकुली लगा रहा।

गवाही दे रही,

मन्दिर की घंटियाँ,

कि आस्माँ फिर से

धरती को दुलहन बना रहा।

प्यार है या ज़रूरत ?

कोई नहीं पहचानता,

क्योंकि आज की दुनिया में,

यह शब्द बन गए हैं,

पर्याय एक दूसरे के।

छुप गईं हैं हकीकतें,

रह गए हैं मुखौटे,

प्यार की धरती पर
उग आएं हैं काँटे।
मना लेने दो ज़श्न
जी भर आज रात को।

सजा लेने दो भाल पर,




अनगिनत सितारे, भेंट में देने दो,  
                                     
चन्द्रमा का हार,


रात की इस दुल्हन को।
गम न करो,
देख रोशनी की परछाई,

इस ठहरे हुए पानी में,

क्योंकि सूरज कभी मरता नहीं है,

वह फिर आएगा...



अँधेरे की इस

रोशनी को झुठलाने,

अपने हक़ वापिस लेने

और दुनिया को

हक़ीकत की रोशनी देने।


  (निज काव्य संग्रह -बोनसाई संवेदनाओं के सूरजमुखी से)