बुधवार, 23 मार्च 2016

                             

                        -होली-                                                   
सोचा इस बार ,
मैं भी जलाऊँ होली
मैंने झांका हृदय में अपने,,
देखा एक बड़ा सा,
स्तम्भ था अहं का,
उसे घसीट कर लाई,
और  गाड़ दिया,
बीच में,
फिर गई, देखा,
कुछ ईर्ष्या,द्वैष के
‘उपले’ पड़े हैं,
ले आई उन्हें ढोकर,
और अहं के लकड़ॆ के,
आसपास जमा दिया।
फिर टटोला  मन को,
लालच के मीठे-मीठे बताशे,
बिखरे हुए थे इधर-उधर ,
उन्हें किया एकत्र और
बना ली उनकी माला
उसे भी लगा दिया,
होली के डंडे पर ।
एक डिबिया मिली ,
जिसमें रखी थीं ,
कई तीलियाँ क्रोध की ,
उन्हें ले आई और ,
रगड़ कर उन्हें
कर दी प्रज्जवलित
अग्नि
धूँ-धूँ धूँ..धूँ
जलने लगी होली ।
मन में छुपी कुछ धारणाओं के  
नारियल को भी किया
समर्पित ।
भावनाओं के शीतल जल
से परिक्रमा कर,
देखती रही,
उठती चिनगारियों को।
अपने विकारों की अग्नि में,
जल कर भी जब
प्रह्लाद की भाँति
सत्य का नारियल
बाहर निकल आया तो,
खेलने का मन हुआ होली।
अब लोगों के सब तरह के
रंग देखकर  भी,
मन चहकता रहता है।
लोगों की तीखी और पैनी
पिचकारियाँ झेलकर भी मन
गुदगुदाता रहता है।
अब होली बन गई है
एक उत्सव
मन का भी।
           
                                       --मंजु महिमा भटनागर-28/2/2010


रविवार, 6 मार्च 2016

चौखट

                    चौखट – मंजु महिमा


सदियों से रही हूँ कैद,

चौखट में.
चौखट-दर-चौखट
घूमती रही हूँ मैं.
चौखट को ही,
अपना धर्म, कर्म, ईमान,
समझती रही हूँ मैं.
‘बंधुआ-औरत’ बनी,
जन्म से ही घुट्टी में,
‘परिवार-सेवा-धर्म’ को,
घूँट-घूँट पीती रही हूँ मैं.
पति-पत्नी के रिश्ते को,
स्वामी औ दासी के,
रिश्तों में जीती रही हूँ मैं.
सीता की लक्ष्मण-रेखा का,
उदाहरण सुन-सुनकर
सदैव सहमती रही हूँ मैं.
गृह-लक्ष्मी,अन्नपूर्णा के
तमगे पहने,महानता के चोगों में
सजती-संवरती रही हूँ मैं.
लेकिन अब मैंने,
अपनी यह घुट्टी,
आज की बेटियों से
रख दी है छिपाकर.
दूर ही रखा है उन्हें,
पाबंदी के अहसास से,
चौखट की.
आज वह अपने पैरों से,
चौखट उलांघ
खुले आसमान में
लेने लगी हैं साँस,
पति उनका स्वामी नहीं,
जिसकी आज्ञा बिना वे
नहीं उलांघ सकती चौखट.
अब वह उनका मित्र है,
हमसफ़र है,
है जीवन साथी,
जो आज्ञा नहीं,
सलाह देता है,
सहयोग करता है.
देखती हूँ मैं ,
वे बंधी आज भी हैं,
लेकिन किसी मज़बूरी,
भय से नहीं,
प्यार की डोर से.
वे अपनी चौखट को भूली नहीं,
उसे सजाती हैं, पूजती हैं,
पर अपने लिए उन पर
ताले नहीं लगाने देती हैं.
मैं निहारती हूँ उन्हें,
अपनी चौखट से
और खुश होती हूँ.
बताती हूँ, उन्हें
चौखट अवरोध नहीं,
एक माध्यम है
हमें आसमान दिखाने का.
अपने आप को
        आतंरिक प्रदूषण से बचाने का.