शनिवार, 11 मई 2013

माँ:मेरी चिरागेज़िनी


    माँ : मेरी चिरागेज़िनी

जब नहीं होती है माँ,
तभी बहुत याद आती है माँ,
यूं तो हवा की तरह कब
साँसों में आती-जाती रहती थी?
कब पानी की तरह अपनी,
ममता से प्यास बुझाती रहती थी?
खाने की तरह कब हमारी
भूख मिटाती रहती थी?
कुछ पता ही नहीं चलता था,
उसका होना अपने वज़ूद से
इस कदर जुड़ा रहता था कि,
कभी अलगाव ही महसूस नहीं होता.
पर जब नहीं होती है माँ,
तभी बहुत याद आती है माँ...
आज नहीं होने पर
होता है महसूस कि माँ! तुम मेरे लिए चरागेज़िन थीं, जो मेरी ,
हर ज़रूरत को चुटकी में,
पूरा कर दिया करती थीं
कब कैसे नींद न आने पर,
थपकियों से सुला दिया करतीं थीं|
सपनों को मेरे साकार कर
आकार दिया करती थीं,
सच ही माँ !
तुम चिरागेज़िन हुआ करती थीं
             ..........मंजु महिमा     

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें