रविवार, 5 मई 2013

सृजन


सृजन
देख रहीं मेरी आँखें,
एक असीम आसमान,
नि:स्तब्ध,शांत, गहन।
बहती एक सरिता,
उसमें तैरते कुछ,
अदृश्य से कण ,
बढे जा रहे ,
नदी के प्रवाह में,
और विलीन हो गए,
सागर में,
बनने को एक दिन
हिमकण ।
और कुछ समय बाद ,
यही हिमकण पाकर उष्णता ,
फिर प्रवाह में आगए ।
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देख रही हैं मेरी आंखें----
उठती हुई ज्वालाएं,
काँपती लौ से
निकलती कुछ ,
चिनगारियां ,
उठ गईं
अनंत आकाश की ओर ,
समेट लिया जिन्हें,
वारिद ने अपने
अंक में,
वाष्पीकृत हो वह,
फिर आगई धरा पर,
फिर एक नए रूप में।
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देख रही मेरी आँखें
एक बवंडर ,
ऊपर तक उठता हुआ,
लिए अनेक ,
पत्तों को।
धूल में उछालता ,
लिए जा रहा ,
दूर-दूर कहीं

अपने साथ।
थमने पर सभी,
फैल गए,
दूर-दूर तक

आ गिरे धरा पर ।
माटी ने उन्हें,
सहेज लिया,अपने
अंक में,
उर्वरक बन फिर ,
वे तैयार हो गए,
नवीन बीज पनपाने को,
सृष्टि का यह कैसा चक्र है?
आकाश, जल, अग्नि ,भूमि
पवन से घिरा जीवकण ,
मृत होकर भी,
पुन:पुन: जीवंत हो उठता है,
सृजन रुकता नहीं है, सृजन रुकता नहीं है।
 --------मंजु महिमा 

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