-क़त्ल सूरज का-
ठहरी हुई नदी,
चमकती इमारतें,
बुझी झोपड़ी ।
लाल आसमां,
अवनि के माथे पर,
शुक्र के तारे की
टिकुली लगा रहा।
गवाही दे रही,
मन्दिर की घंटियाँ,
कि आस्माँ फिर से
धरती को दुलहन बना रहा।
प्यार है या ज़रूरत ?
कोई नहीं पहचानता,
क्योंकि आज की दुनिया में,
यह शब्द बन गए हैं,
पर्याय एक दूसरे के।
छुप गईं हैं हकीकतें,
रह गए हैं मुखौटे,
प्यार की धरती पर
उग आएं हैं काँटे।
मना लेने दो ज़श्न
जी भर आज रात को।
सजा लेने दो भाल पर,
चन्द्रमा का हार,
रात की इस दुल्हन को।
गम न करो,
देख रोशनी की परछाई,
इस ठहरे हुए पानी में,
क्योंकि सूरज कभी मरता नहीं है,
अँधेरे की इस
रोशनी को झुठलाने,
हक़ीकत की रोशनी देने।
(निज काव्य संग्रह -बोनसाई संवेदनाओं के सूरजमुखी से)



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