फ़ितरत ?
मैंने पूछा,”मैं करूँ क्या?
कैसे जियूं इस संसार में?”
कहा पवन ने मुझसे,
”उलटी बहो, जैसे मैं बहती हूँ आजकल,
उड़ाकर ले जाओ सभी को,
यह बात और है कि
सब तहस-नहस हो जाएगा.”
तालाब ने कहा, “मेरी तरह दायरे में रहो,
हाँ, जल कुम्भियाँ,
ज़रूर तुम पर छाने की कोशिश करेंगी,
पर, कुछ पर्यावरण-प्रेमी आएँगे,
तुम्हें मुक्त करवाने का नाटक करेंगे,
पर, जल-कुम्भियों की जड़ें बहुत गहरी होती हैं,
ये फिर उग आएंगी, तुम्हें इनकी आदत हो जाएगी.”
नदी ने कहा, “धीमे बहो, जैसे हम
बह रही हैं, गन्दगी को दर किनार करके .”
सागर बोला, “ मेरी तरह बन जाओ,
हवा के साथ अपने में जोश लाओ,
खूब शोर करके, आगे बढ़ो
रौरव के साथ चट्टानों से भी टकराओ ,
यह बात और है कि
चिकनी-चट्टानों पर तुम्हारा असर नहीं होगा,
पर शायद कुछ गन्दगी साफ़ हो जाए.”
पेड़ ने कहा, “ मेरी तरह एक जगह खड़ी होकर,
तमाशा देखो,
जब काटने वाले आएँ तो,
हो सकता है बचाने वाले आएँ,
तुम्हें तख्ती पहनाने,
पर, कुछ समय बाद तुम
अपने को कटा हुआ पाओगी,
शायद शहीदों में नाम लिखा जाओगी.”
सोचा मैंने, क्या करूं?
एक नई दुनिया ही बसा डालूँ ?
दूसरे पल ख्याल आया,
पर वहाँ भी तो यही सब होंगे,
और यही फ़ितरत,
कैसे बदलेगी यह ????????
(१३/२/२००१३)
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