शुक्रवार, 18 मई 2012



समंदर के किनारे

आओ समंदर किनारे,
रेत के घरौंदे बनाएँ,
खेल-खेल में,
मौजों से टकराएँ.
हाथ में हाथ लिए,
दूर तक चलें .
जाफरानी धूप में,
कुछ देर नहाएं.
नीलगूं समंदर को,
देर तक देखते.
कुछ सुहाने पलों से,
चलो भुला के सारे गम,                                  
समंदर के किनारे,
बैठ बतियाएं,
कुछ तुम्हारी सुनें,
कुछ अपनी सुनाएं.
दूरियां मिट जाए,                                                                            हर तरह की.                                                                
नज़दीकियाँ हों,
धड़कनों की.
चलो भुला के सारे गम,                                   
समंदर के किनारे,
बैठ बतियाएं.


सोमवार, 14 मई 2012

सिलसिले कदमों के

सिलसिले कदमो के कुछ, 
इस तरह बनते रहें.
बढ़ते रहें कदम निरंतर,
पीछे निशान बनते रहें.



रखे कदम कुछ इस तरह,
जम कर जमी पर बिन थके,
चलते रहे हम बिन रुके,
पीछे निशान बनते रहें...