शनिवार, 20 जुलाई 2019

यात्रा वृतांत- सजीव कौन? निर्जीव कौन?



-हेमिल्टन, न्यूजर्सी, अमेरिका-2018
                                                   -- सजीव कौन? निर्जीव कौन?
                      अद्भुत शिल्प पार्क-मूर्तियों की सजीवता ने मूर्ति बनाया हमें भी. अभी तक हमने मूर्तियाँ चौराहों, ...किसी पार्क अथवा म्यूज़ियम में ही रखी हुई देखी थीं, लेकिन अमेरिका के न्यूजर्सी में हेमिल्टन, ट्रेंटन में 42 एकड़ में फैला पार्क ‘Grounds For Sculpture’ अनगिनत मूर्तियों और शिल्प-कृतियों से भरा पड़ा है. हर मूर्ति इतनी सजीव है कि आँखें धोखा खा जाती हैं. लोहे-इस्पात जैसी कठोर धातु को पिघलाकर उसमें इतनी सजीवता भर देना, दाँतों तले उंगुली दबा देने जैसा है. हर मूर्ति बोलती, क्रियाशील नज़र आती है. 
जैसे ही हम ट्रेंटन की सीमा में प्रवेश करते हैं, वहां के चौराहों, सड़क के किनारे पर लगी मूर्तियाँ और विभिन्न शिल्प-आकृतियाँ मार्ग निर्देश देती हुई सी नज़र आती हैं.

           मेडम तुसाद (Madame Tussaud) के मोम-म्यूजियम में मूर्तियाँ मोम में ढली होती हैं, पर उनके कपडे, बाल, आँखें सब ऊपर से स्वाभाविक रूप में ही लगाए गए हैं, लेकिन इन मूर्तियों की विशेष बात यह है कि इनमें सभी कुछ इस्पात में ही निर्मित है, सर का एक एक बाल, कपड़ों की एक-एक सिलवट, शरीर की एक-एक शिरा आदि सभी इस्पात में ही उभारे गए हैं, जिन्हें विभिन्न रंगों से पेण्ट करके स्वभाविक और सजीव सा बना दिया है.
      
         अप्रतिम!!! ये आदमकद तथा कुछ इससे भी बडी मूर्तियाँ किसी बंद कमरे में नहीं, वरन पूरे 42 एकड़ पार्क में जगह-जगह इतने स्वाभाविक रूप में रखीं गईं है कि घूमते घूमते एकाएक तो इन्हें इंसान समझ कर धोखा ही खा जाएं. इनमें सजीवता इतनी है कि इनके साथ बतियाने का, बैठने का मन होने लगता है, विभिन्न मुद्राओं में सजी ये मूर्तियाँ, हमको भी अपने साथ वैसी ही मुद्रा बनाने को विवश कर देती हैं.
                   
            कहीं पार्क में लेटे हुए अखबार मुँह पर लेकर सोते  हुए, जैसे पढ़ते-पढ़ते हुए किसी को नींद आगई है, कहीं बेंच पर बैठे प्रकृति का लुत्फ़ लेते हुए, कहीं बतियाते हुए, कहीं पेड़ों के झुण्ड में अपनी प्रेमिका के साथ मिलते,
कहीं झील के किनारे बैठे, झील में तैरती नौका में बैठे लहरों का आनन्द लेते हुए तो कहीं बैंड के साथ नाचते हुए, रेस्टोरेंट में अपने प्रेमी के साथ भोजन का आनंद लेते हुए, ये अद्भुत मूर्तियाँ हमें ज़िन्दगी का आनंद लेने के लिए हमें आमंत्रित करते हुए नज़र आती हैं.

                             
इन निर्जीव मूर्तियों की सजीवता और जीजिविषा देख कभी-कभी तो हम सजीवों को अपने निर्जीव होने का अहसास होने लगता है.
 

 ‘जीवन एक आनंद है’ का सन्देश देती ये मूर्तियाँ सच ही ज़हन में इतना बस गईं है कि बार-बार मन इनके पास दौड़ता है, इनके साथ नाचने , बतियाने और इनको छूने के लिए.



          सन्1992 में जॉन सेवार्ड जॉनसन और उनकी टीम द्वारा निर्मित कल्पनाओं को साकार रूप देने वाला यह पार्क सच ही शब्दों से परे है. जिस-जिसने भी सुन्दर कल्पनाओं को मूर्त रूप दिया, कठोरता को कोमलता में पिघला कर असुंदर को सुन्दर रूप में ढालकर, उसमें भाव और रंग भरकर जो अद्भुत सन्देश दुनिया को दिया है, उन्हें कोटि-कोटि सलाम करने को जी चाहता है.
        निश्चय ही यह एक व्यक्ति का काम नहीं है, यह कई कलाकारों के जूनून और वर्षों तक किए अथक परिश्रम का परिणाम है जो अप्रतिम है, प्रेरणीय है, अभिनंदनीय है.

 आप जब भी कभी अमेरिका जाएं और न्यूजर्सी में हों तो इस पार्क में जाना मत भूलिए...हालांकि एक दिन में आप पूरा पार्क नहीं देख पाएंगे, पूरा देखने के लिए कम से कम तीन-चार दिन तो चाहिए. इसलिए आपको बार-बार जाना होगा. तब तक आप इन चित्रों से अपना मन बहलाइए और मेरे अनुभवों को इनसे आंकिए.....



©मंजु महिमा
लेख और फ़ोटोज़ के लिए .

शुक्रवार, 19 जुलाई 2019

सारनाथ की सैर



                   सन 2015 में नेपाल के लुम्बिनी में आयोजित दसवें अंतरराष्ट्रीय हिन्दी सम्मेलन में हम साहित्यकार भाग लेने गए थे. वहां जाने के लिए हम पहले वाराणासी गए और वहीँ सभी भारत के कोने-कोने से साहित्यकार एकत्र हुए. वहां से बस के द्वारा पहले हम सारनाथ गए थे.  ऐसी मान्यता बताई जाती है कि लुम्बिनी(नेपाल) जो गौतम बुद्ध की जन्मस्थली है, की यात्रा जब तक पूरी नहीं मानी जाती तब तक कि सारनाथ (भारत) की यात्रा नहीं कर लेते. यह वह स्थान है, जहाँ गौतम बुद्ध ने ज्ञान प्राप्त करने के बाद अपना प्रथम उपदेश दिया था. आइए जानते हैं सारनाथ का इतिहास और मान्यताओं के बारे में. 

          
             काशी अथवा वाराणसी से लगभग 10 कि.मी. दूर स्थित सारनाथ प्रसिद्ध बौद्ध तीर्थ है। पहले यहाँ घना वन हुआ करता था और सारंग (मृग) -विहार किया करते थे। उस समय इसका नाम 'ऋषिपत्तन मृगदाय' था। ज्ञान प्राप्त करने के बाद गौतम बुद्ध ने अपना प्रथम उपदेश यहीं पर दिया था। उन्होंने कौडिन्य आदि अपने पूर्व साथियों को प्रथम बार प्रवचन सुनाकर अपने नये मत में दीक्षित किया था। इसी प्रथम प्रवचन को उन्होंने ‘धर्मचक्रप्रवर्तन’ कहा जो कालांतर में, भारतीय मूर्तिकला के क्षेत्र में सारनाथ का प्रतीक माना गया। बुद्ध ही के जीवनकाल में काशी के श्रेष्टी नंदी ने ऋषिपत्तन में एक बौद्ध विहार बनवाया था। 
           इस परिसर में पहुंचकर एक असीम अलौकिकता का अहसास होता है, मुख्यद्वार में प्रवेश करते ही भगवान् बुद्ध की विशालकाय मूर्ति के दर्शन होते हैं, परिसर में चारों ओर हरियाली और अगाध शांति पसरी हुई नज़र आती है.
      

      सम्राट अशोक के समय में यहाँ बहुत से निर्माण-कार्य हुए। आपकी जानकारी के लिए बता दूं कि  शेरों की मूर्ति वाला भारत का राजचिह्न सारनाथ के अशोक के स्तंभ के शीर्ष से ही लिया गया है, जिसे अशोक महान ने वर्ष 250 ईसा पूर्व में बनवाया था। सारनाथ का स्तंभ ही अशोक स्तंभ के नाम से जाना जाता है। सारनाथ स्थित स्तंभ के शीर्ष पर चार शेर बैठे हैं और सभी की पीठ एक दूसरे से सटी हुई है। सारनाथ के अशोक स्तंभ को भारत ने राष्ट्रीय प्रतीक के रुप में अपनाया है। इसके अलावा अशोक स्तंभ के निचले भाग में स्थित चक्र को भारतीय तिरंगे के मध्य भाग में रखा गया है।  मूल  अशोक स्तंभ सारनाथ संग्रहालय (Sarnath Museum) में रखा गया है। अशोक स्तंभ पर तीन लेख लिखे गए हैं जिनमें से पहला लेख अशोक के ही समय का है और ब्राह्मी लिपि में लिखा गया है। जबकि दूसरा लेख कुषाण काल एवं तीसरा लेख गुप्त काल का है।
       यहाँ का ' धम्मेक  अथवा  धमेख स्तूप सारनाथ की प्राचीनता का आज भी बोध कराता है।  इसे ईसा पूर्व - वर्ष 249 में सम्राट अशोक ने बनवाया था।
 
 धम्मेक स्तूप के साथ यह 50 मीटर लंबा स्तंभ अशोक द्वारा बौद्ध धर्म के लिए का उपहार है। धम्मेक स्तूप बौद्धों के लिए एक महत्वपूर्ण स्थल है, यहाँ पर भगवान बुद्ध ने पहली बार अपने पाठों का प्रचार किया था।  इसलिए इस स्थान का महत्त्व बौद्ध-भिक्षुओं के लिए बहुत ही अधिक था, लेकिन विदेशी आक्रमणों और परस्पर धर्मों की धार्मिक खींचातानी के कारण कालांतर में चलकर सारनाथ का महत्व कम हो गया था।                                          
 मृगदाय में सारंगों की संख्या बहुत होने के कारण सारंगनाथ महादेव की मूर्ति की स्थापना हुई और स्थान का नाम सारनाथ पड़ गया।
       थाई मंदिर सारनाथ में एक प्रसिद्ध आकर्षण का केंद्र है, जो यहां की वास्तुकला की शैली को प्रदर्शित करता है। यह मंदिर सुंदर बगीचों के बीच बना हुआ है, जो यहां आने वाले पर्यटकों और तीर्थयात्रियो का  चुम्बकीय  आकर्षण बन गया  है. यह मंदिर स्वर्ण-मूर्तियों से सज्जित है. यहां पर बौद्ध भिक्षुओं द्वारा शांत और शांतिपूर्ण वातावरण सृजित किया गया है। 

          
                    चौखंडी स्तूप को पूरे उत्तर प्रदेश के सभी पवित्र तीर्थ स्थलों में सबसे अधिक पवित्र और पर्यटकों द्वारा सबसे ज्यादा देखा जाने वाला स्तूप बताया जाता है। चौखंडी स्तूप को बौद्ध संस्कृति के सबसे दिव्य और महत्वपूर्ण स्मारकों में से एक बताया जाता है। इस स्तूप का निर्माण ठीक उसी जगह पर किया गया है, जहाँ महान भगवान बुद्ध की मुलाकात अपने पांच तपस्वियों से हुई थी। इन पांच तपस्वियों के द्वारा बुद्ध ने अपनी पहली शिक्षाओं का प्रचार किया। इस प्रमुख घटना के स्मरणोत्सव के रूप में यहां स्मारक का निर्माण किया गया है, जो बौद्ध धर्म के उदय में काफी सहायक रहा। अगर आप इस जगह पर जायेंगे तो यहां चारों ओर से बहती हुई गर्म हवा में भी आपको स्मारक की दिव्यता और शीतलता महसूस होगी। चौखंडी स्तूप जाने के बाद पर्यटकों को एक अलग ही शांति की प्राप्ति होती जो बेहद अद्भुत है। 


             मूलगन्धकुटी विहारये वही टूटा मंदिर है, जिस जगह है, जहाँ बुद्ध ने अपनी पहली वर्षा ऋतु देखी थी।

                  
              सन 1910 में स्थापित पुरातत्व संग्रहालय तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व से 12 वीं शताब्दी ईस्वी तक के कलाकृतियों के संग्रह का प्रदर्शन करता है। अगर आप सारनाथ की यात्रा करने आते हैं तो इस संग्रहालय में रखी हुई प्राचीन कलाकृतियों देखने जरूर जाएं ।
               अब तक तो हमने विभिन्न मनुष्यों और वस्तुओं को ही दूसरे देशों में स्थान्तरित होते हुए सुना था, पर यह बौद्धधर्म जिसका प्रारम्भ भारत से हुआ और आज यह दूसरे देशों में जाकर उनकी धरोहर बन गया है, उनकी असीम आस्था और निष्ठा का प्रतीक बन एशिया के कई बड़े देशों में रच- बस गया है.
                चिलचिलाती धूप में वहाँ घूमना तपोवन का अहसास दिला रहा था... पर शांत रूप से खड़ी भगवान बौद्ध की विशालतम प्रतिमा को देख उनकी महानता और अपनी लघुता और दुर्बलता का भी अहसास हो रहा था.
                 ...वहाँ के कुछ स्मृति-चिह्न जो कैमरे में कैद होगए है, जिन्हें मैं इस लेख के साथ आप सबसे साझा कर आज़ाद कर रही हूँ . 

                     इतना सब जानने के बाद हमारी 
आध्यात्मिक यात्रा, अब साहित्यिक यात्रा बन सारनाथ से चल पड़ी लमही की ओर जो सुप्रसिद्ध लेखक मुंशी प्रेमचद जी का निवास स्थान रहा है.
© मंजु महिमा


गुरुवार, 18 जुलाई 2019

सत्तर से सात—डिज़्नी वर्ल्ड की सैर





सत्तर से सात— मंजु महिमा

           शीर्षक देख आप चकित होंगे कि यह उलटी गिनती कैसे? (वैसे ठीक ही तो है, अब तो उलटी गिनती गिनने का समय ही आगया है)..हमारे सभी हम-उम्र अपने बचपन को याद करके यही कहते हैं कि बचपन लौट कर नहीं आता...पर यह मेरी खुशनसीबी है कि मैं कह सकती हूँ कि मैंने यहाँ आकर अपने बचपन को लौटा लिया है, अपने सात वर्षीय नाती रोहित के साथ. उसके साथ उसके स्कूल जाना,पार्क में खेलना, जू आदि देखना आदि बचपन की चौखट पर खड़ा कर देता है. इस बार मेरी सत्तरवीं वर्षगांठ को सातवीं वर्षगांठ की तरह मनाया गया. मुझे एत्लान्टा में 'कोकोकोला प्रदर्शनी', 'फिश एक्वेरियम', 'डोल्फिन शो' और फ्लोरिडा के 'डिज्नीवर्ल्ड' , NASA की सैर रवाकर.इसका श्रेय जाता है मेरे नाति रोहितदामाद सौरभ और बेटी वृंदा को
आइए हम जानते हैं पहले डिज़्नी वर्ल्ड के बारे में--
              अमेरिका के एक राज्य फ्लोरिडा में ऑरलैंडो (Orlando) शहर है, जहां डिज़्नी वर्ल्ड करीब 30,500 एकड़ में फैला हुआ है I जिसमें 4 बड़े-बड़े थीम पार्क हैं- मैजिक किंग्डम, EPCOT सेंटर, एनीमल किंगडम, होलीवुड स्टूडियोज
               मैं जानती हूँ कि आजकल के सभी बच्चे कार्टून फिल्मों और उनके पात्रों से भली भाँती परिचित होते हैं, लेकिन डिज़्नी वर्ल्ड में इन्हीं कार्टून फिल्म्समिकी माउस’; 'स्लीपिंग ब्यूटी' , 'लेडी एंड ट्रैम्प' , 'वन हंड्रेड एंड वन डलमेटियन्स' , 'स्नो व्हाइट एंड सेवेन ड्वार्फ्स', 'ऐलिस इन वंडरलैंड' , ' लिटिल मरमेड', 'अलादीन', 'पोकेमॉन गो' आदि मशहूर काल्पनिक कहानियों के पात्रों को सजीव रूप में इधर-उधर घूमते देखना, उनसे हाथ मिलाना, उनसे मिलना और उनके साथ फोटो खिचवाने के लिए घंटों कतार में खड़े रहना सच ही बड़ा रोमांचकारी अनुभव था
  बचपन में देखे सपने अब बुढ़ापे में कार्यान्वित होंगे, कभी सोचा ही नहीं था, उन्हें मैं तो भुला ही चुकी थी. लेकिन अपने नाति रोहित के साथ मैं भी 7 साल की कैसे बन गई, पता ही नहीं लगा. हम दोनों उन काल्पनिक चित्रों के सजीव पात्रों के पीछे पागलों की तरह भागते रहे, उन्हें देख तालियाँ बजाते रहे, नृत्य करते रहे, उनके साथ फोटो खिचवाते रहे.. साथ ही वहां की तरह तरह की डरावनी, कठिन, रोमांचकराइड्समें बैठ जोर जोर से चिल्लाते रहे...पशु-पक्षियों की नक़ल आदि कार्यों में मज़े करते रहे ...जिसका आनंद आप शब्दों से कम चित्रों से अधिक ले सकते हैं----
इन सबकी कुछ यादगार तस्वीरें आपके साथ शेयर कर रही हूँ... 😎





© मंजु महिमा