मंगलवार, 3 दिसंबर 2013

हथेलियों में सूरज


  -हथेलियों में सूरज-

जी चाहता है उगा लूँ,
हथेलियों में अपनी,
एक नन्हा सूरज,
जो जला सके
उन गिद्धई वासना-रत
निगाहों को,
जो ताकती रहती है,
अबोध अहिल्याओं को.
जी चाहता है उगा लूँ,
हथेलियों में अपनी,
एक नन्हा सूरज,
कर सके जो भस्म ,
उन बलात्कारियों को,
जो छिपे हैं आज भी,
सबकी निगाहों से,
और गरज रहे हैं,
शेर बन कर.
जी चाहता है उगा लूँ,
हथेलियों में अपनी,
एक नन्हा सूरज,
जिसकी किरणें समा जाएँ,
कलम में मेरी,
उधेड़ दे जो बखिए,
सिले हुए राज़ो के,
हो जाएँ जिनसे रोशन,
उनके अँधेरे के गुनाह,
जो पाएं हैं पनाह सत्ता की,
कर भस्म उनके आशियानों को,
कर दूं उन्हें,
भटकने को मज़बूर .
जी चाहता है उगा लूँ,
हथेलियों में अपनी,
एक नन्हा सूरज,
कर दूँ भस्म उन,
तथाकथित नेताओं को,
जो नेता कम पिछलग्गू
अधिक आते हैं नज़र,
जो छिपाएं हैं सफेदी में,
अपने कर्मों की कालिख,
और ढा रहे हैं कहर.
नोटों के नशे में धुत्त,
जिनकी कलम तुलती है,
करोड़ों में.
जिनके कालीन के तले,
बिछे होते हैं,
अरबों-खरबों रुपए,
भविष्य को कर सुरक्षित,
सो रहे हैं जो बेखबर.
जी चाहता है उगा लूँ,
हथेलियों में अपनी,
एक नन्हा सूरज,
कर दूँ भस्म,
उन देशद्रोहियों को,
जो देश में आज भी,
घूम रहे हैं ज़िंदा,
कर रहे आतंकित,
जनता को पहन मुखौटा.
जी चाहता है उगा लूँ,
हथेलियों में अपनी,
एक नन्हा सूरज,
जो बनकर आए
एक आशा की किरण
उन हृदयों में
जो आज बुझ चुके हैं,
खो बैठे हैं अपनी आस्था
सत्ता के प्रति  
जो लाए एक स्वर्णिम प्रभात,
उन चंद इंसानों के लिए,
जो आज भी सत्य के साए में  
ईमानदारी और विश्वास को लपेटे
गठरी बने बैठे हैं,
अपने घरोंदे में. 
जी चाहता है उगा लूँ,
हथेलियों में अपनी,
एक नन्हा सूरज,
नहीं खौफ़ तनिक मुझे
अपनी हथेलियाँ जलने का,
राहत ही मिलेगी तब,
कर सकूंगी जब कुछ तो,
दिशाहीन,
भटकते समाज को
रोशनी से रु-बरू करवाकर.
-----मंजु महिमा

१/११/२०१३     

रविवार, 28 जुलाई 2013

उत्तराखंड-सुप्रभात


जून 2006 में जब हम उत्तराखंड -नैनीताल आदि स्थानों पर भ्रमण हेतु

 गए थे, तभी अद्भुत प्राकृतिक दृश्यों को देखकर जो भाव उमड़े, उन्हीं 

को 


कलम बद्ध कर रहीं हूँ यहाँ.







                                                          -हायकु-

                  हिम श्रृंखला,

                फैलीं रवि रश्मियाँ,



                   हेम सदृष्य.
            

                (6-6-2006)





नैनीताल झील के चार प्रहर
-प्रात:काल-
                                               
मधुर निद्रा में मुस्काती.

अल्हड कन्या सी,

तैर रही जिसकी,

झील सी आंखों में,

रुपहरी स्वपनिल मछलियाँ.

-मध्याह्न-काल –
एक सुघड़ गृहणी सी,
व्यस्त भागती-दौड़ती,
अपने काम निबटाती.

क्षण भर भी नहीं
देख पाती दर्पण,
कर देती है अपना आतिथ्य
अतिथियों को अर्पण .

संध्या-काल-
एक नायिका सी,
भाल पर सिंदूरी टीका,
सूरज का लगाए ,
सुनहरी गोट लगा,
पहन वारिद का परिधान,
                                                                       
                                                         
                                                            
घंटे-ढोल-मंजीरों की ध्वनि से

उतारती आरती,

माँ नैना देवी की,

कर रही अर्पण

प्रकाश-दीप अनेक,

अपने हृदय-सम झील में.
                                                                              
            
                                                                   
रात्रि–काल-
                                                             

दुल्हन सी संवरी,
ओढ़ सितारों की ओढ़नी,
निरख रही,
प्रतिबिम्बित अपनी छवि को,
अपने ही दर्पण में

यह झील नैनीताल की.

.कर रही मंत्र-मुग्ध प्रवासियों को

यह झील नैनीताल की .



शनिवार, 6 जुलाई 2013

सिरहाने के ख़्वाब



कुछ ख़्वाब जो सिरहाने रहते हैं,
मुझे सहलाए रहते हैं.
निकाल गहन अँधेरे के बीहड़ से ,
लिए जाते हैं उन्मुक्त आकाश,
मुक्तता का करवाते हैं अहसास.
कुछ ख़्वाब जो..........
होकर इन पर सवार,
पहुँचती हूँ, ऐसे द्वार ,
जहाँ सृजन की गूंजती है,
प्रतिध्वनियाँ  बार-बार.
कल्पना लेती है आकार ,
चेतना के हिरनौटे,
भरते हैं कुलांच.
उम्मीदों के उपवन में,
बिखर जाते हैं पारिजात,
समेटती रहती हूँ जिन्हें,
आँचल में अपने सारी रात.
चाहती हूँ पिरोना,
इन वारिदों को शब्दों में,
पर ये कहाँ आते हैं पकड़ में ?
भगाते रहते हैं मुझे दिन ओ’ रात.
थक कर जब मैं विश्रान्ति पाती हूँ,
तभी फुदक कर आ जाते हैं,
जाते हैं दुबक सिरहाने मेरे,
गहरा जाती है....... रात.
कुछ ख़्वाब जो..............

-मंजु महिमा -सित.२०१२ 

गुरुवार, 4 जुलाई 2013

चंपा : हल्दियाई हथेलियाँ



हल्दिया हाथों ने
फैला दीं हथेलियाँ,
और लिख दिया
किरणों ने नाम चुपके से
प्रियतम का .
शर्मसार हुईं पंखुरियाँ,
सिहर-सिहर गईं,
लहक गईं डालियाँ,
महक सी छा गई वादियों में,
पवन ने दिया संदेशा,
ली है अंगडाई सजन ने,
चम्पई मन हो उठा गदगद ,
सुंदर सपने सा रोमांचक .
शुचिपूर्ण चम्पा,
गदरा उठी वादियों में,
कलियों ने खोल दिए पट,
सद्यस्नाता सी,
ओस की बूँदें  बदन पर लिए,
कैसी ओजस्विनी लग रही है !
मेरे आँगन में खिली चम्पा.

------------------------------------मंजु महिमा (अहमदाबाद)—24/6/2013

शुक्रवार, 28 जून 2013

औरत : एक बोनसाई


जड़े तराश तराश कर बोनसाई तो अब बनाए जाने लगे हैं,



पर औरत तो सदियों पहले ही बोनसाई बना दी गई थी.



वह अपने गृहस्थी के गमले में उग तो सकती है, 



पर वह अपने गुणानुरूप  



पुरुष से ऊँची उठ नहीं सकती,


वह फल तो दे तो सकती है , पर 



उनकी सुरभि फैला नहीं सकती ,



वह बन कर रह गई  



बस घर की  सजावट  मात्र.



जिसे सुविधानुसार जब चाहे तब,



कहीं भी , कैसे भी  सजा दिया जाता है.



जड़े तराश तराश कर बोनसाई तो अब बनाए जाने लगे हैं,




पर औरत तो सदियों पहले ही बोनसाई बना दी गई थी

.

(काश कि अब ऐसा हो कि औरत अब बोनसाई बनकर न रहे...)



(जन. १९९१)

शनिवार, 11 मई 2013

माँ:मेरी चिरागेज़िनी


    माँ : मेरी चिरागेज़िनी

जब नहीं होती है माँ,
तभी बहुत याद आती है माँ,
यूं तो हवा की तरह कब
साँसों में आती-जाती रहती थी?
कब पानी की तरह अपनी,
ममता से प्यास बुझाती रहती थी?
खाने की तरह कब हमारी
भूख मिटाती रहती थी?
कुछ पता ही नहीं चलता था,
उसका होना अपने वज़ूद से
इस कदर जुड़ा रहता था कि,
कभी अलगाव ही महसूस नहीं होता.
पर जब नहीं होती है माँ,
तभी बहुत याद आती है माँ...
आज नहीं होने पर
होता है महसूस कि माँ! तुम मेरे लिए चरागेज़िन थीं, जो मेरी ,
हर ज़रूरत को चुटकी में,
पूरा कर दिया करती थीं
कब कैसे नींद न आने पर,
थपकियों से सुला दिया करतीं थीं|
सपनों को मेरे साकार कर
आकार दिया करती थीं,
सच ही माँ !
तुम चिरागेज़िन हुआ करती थीं
             ..........मंजु महिमा