शुक्रवार, 28 जून 2013

औरत : एक बोनसाई


जड़े तराश तराश कर बोनसाई तो अब बनाए जाने लगे हैं,



पर औरत तो सदियों पहले ही बोनसाई बना दी गई थी.



वह अपने गृहस्थी के गमले में उग तो सकती है, 



पर वह अपने गुणानुरूप  



पुरुष से ऊँची उठ नहीं सकती,


वह फल तो दे तो सकती है , पर 



उनकी सुरभि फैला नहीं सकती ,



वह बन कर रह गई  



बस घर की  सजावट  मात्र.



जिसे सुविधानुसार जब चाहे तब,



कहीं भी , कैसे भी  सजा दिया जाता है.



जड़े तराश तराश कर बोनसाई तो अब बनाए जाने लगे हैं,




पर औरत तो सदियों पहले ही बोनसाई बना दी गई थी

.

(काश कि अब ऐसा हो कि औरत अब बोनसाई बनकर न रहे...)



(जन. १९९१)

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