जून 2006 में जब हम उत्तराखंड -नैनीताल आदि स्थानों पर भ्रमण हेतु
गए थे, तभी अद्भुत प्राकृतिक दृश्यों को देखकर जो भाव उमड़े, उन्हीं
को
कलम बद्ध कर रहीं हूँ यहाँ.
-हायकु-
हिम श्रृंखला,
फैलीं रवि रश्मियाँ,
हेम सदृष्य.
(6-6-2006)
नैनीताल झील के चार
प्रहर
-प्रात:काल-
मधुर निद्रा में
मुस्काती.
अल्हड कन्या सी,
तैर रही जिसकी,
झील सी आंखों में,
रुपहरी स्वपनिल मछलियाँ.
-मध्याह्न-काल –
एक सुघड़ गृहणी सी,
व्यस्त भागती-दौड़ती,
अपने काम निबटाती.
क्षण भर भी नहीं
देख पाती दर्पण,
कर देती है अपना आतिथ्य
अतिथियों को अर्पण .
संध्या-काल-
एक नायिका सी,
भाल पर सिंदूरी टीका,
सूरज का लगाए ,
सुनहरी गोट लगा,
पहन वारिद का परिधान,








आपके प्रतिभावों की प्रतीक्षा रहेगी.
जवाब देंहटाएं