शनिवार, 6 जुलाई 2013

सिरहाने के ख़्वाब



कुछ ख़्वाब जो सिरहाने रहते हैं,
मुझे सहलाए रहते हैं.
निकाल गहन अँधेरे के बीहड़ से ,
लिए जाते हैं उन्मुक्त आकाश,
मुक्तता का करवाते हैं अहसास.
कुछ ख़्वाब जो..........
होकर इन पर सवार,
पहुँचती हूँ, ऐसे द्वार ,
जहाँ सृजन की गूंजती है,
प्रतिध्वनियाँ  बार-बार.
कल्पना लेती है आकार ,
चेतना के हिरनौटे,
भरते हैं कुलांच.
उम्मीदों के उपवन में,
बिखर जाते हैं पारिजात,
समेटती रहती हूँ जिन्हें,
आँचल में अपने सारी रात.
चाहती हूँ पिरोना,
इन वारिदों को शब्दों में,
पर ये कहाँ आते हैं पकड़ में ?
भगाते रहते हैं मुझे दिन ओ’ रात.
थक कर जब मैं विश्रान्ति पाती हूँ,
तभी फुदक कर आ जाते हैं,
जाते हैं दुबक सिरहाने मेरे,
गहरा जाती है....... रात.
कुछ ख़्वाब जो..............

-मंजु महिमा -सित.२०१२ 

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