बुधवार, 31 जनवरी 2018
गुरुवार, 28 सितंबर 2017
विजय-पर्व
बस
एक रावण मारने
से
क्या होगा
राम?
यहाँ तो अनेक
रावण
अनेक भेष में,
अनेक मुखौटे
लगाए,
चुरा बैठे
हैं,
सत्य की सीता
को.
कैसे पहचानोगे
उसे?
कैसे सुखा
पाओगे
उसका अमृत
कलश?
पता है
तुम्हें?
अब वह उसकी
नाभि में नहीं,
स्विस बैंक
में है,
बाथरूम की
दीवारों में,
सोफों की
दरारों में,
सागर के रसातल
में,
संतों के
आश्रमों में,
मंदिरों के गर्भ-गृहों में,
अस्पतालों के
थियेटरों में,
शिक्षा के
गलियारों में,
रक्षकों के
हथियारों में,
और भी ना जाने
कहाँ-कहाँ अपनों
में
छुपा बैठा है
|
कौन तुम्हें
बताएगा?
विभीषण भी,
अब डरा-डरा सा
है,
क्योंकि
उसे भी बहुत
बदनाम किया
है,
‘घर का भेदी’
कहकर
लांछित
किया है
दुनिया ने.
पर अब ज़माना
गया है बदल,
अत:
तुम्हें भी अब
अपनी नीति
बदलनी होगी,
पैंतरे बदलने
होंगे.
राम नहीं
बनना होगा
अर्जुन,
और लड़ना होगा,
अन्याय व
भ्रष्टाचार के खिलाफ.
उठाना होगा,
गाण्डीव
अपने ही लोगों
के ऊपर,
जिनमें छुपा
हुआ है,
रावण
और कराना होगा
मुक्त,
सत्य की सीता
को,
उसके
प्रगल्भ जाल
से,
तभी मनेगा
हे राम !
हमारा विजय पर्व...
प्रतीक्षारत ....
तभी मनेगा
हे राम !
हमारा विजय पर्व...
प्रतीक्षारत ....
©----मंजु महिमा
विजय-दशमी पर्व -1988
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बुधवार, 23 मार्च 2016
-होली-
सोचा इस बार ,
मैं भी जलाऊँ होली
मैंने झांका हृदय में अपने,,
देखा एक बड़ा सा,
स्तम्भ था अहं का,
उसे घसीट कर लाई,
और गाड़ दिया,
बीच में,
फिर गई, देखा,
कुछ ईर्ष्या,द्वैष के
‘उपले’ पड़े हैं,
ले आई उन्हें ढोकर,
और अहं के लकड़ॆ के,
आसपास जमा दिया।
फिर टटोला मन को,
लालच के मीठे-मीठे बताशे,
बिखरे हुए थे इधर-उधर ,
उन्हें किया एकत्र और
बना ली उनकी माला
उसे भी लगा दिया,
होली के डंडे पर ।
एक डिबिया मिली ,
जिसमें रखी थीं ,
कई तीलियाँ क्रोध की ,
उन्हें ले आई और ,
रगड़ कर उन्हें
कर दी प्रज्जवलित
अग्नि
धूँ-धूँ धूँ..धूँ
जलने लगी होली ।
मन में छुपी कुछ धारणाओं के
नारियल को भी किया
समर्पित ।
भावनाओं के शीतल जल
से परिक्रमा कर,
देखती रही,
उठती चिनगारियों को।
अपने विकारों की अग्नि में,
जल कर भी जब
प्रह्लाद की भाँति
सत्य का नारियल
बाहर निकल आया तो,
खेलने का मन हुआ होली।
अब लोगों के सब तरह के
रंग देखकर भी,
मन चहकता रहता है।
लोगों की तीखी और पैनी
पिचकारियाँ झेलकर भी मन
गुदगुदाता रहता है।
अब होली बन गई है
एक उत्सव
मन का भी।
--मंजु
महिमा भटनागर-28/2/2010
रविवार, 6 मार्च 2016
चौखट
चौखट – मंजु महिमा
सदियों से रही हूँ
कैद,
चौखट में.
चौखट-दर-चौखट
घूमती रही हूँ मैं.
चौखट को ही,
अपना धर्म, कर्म,
ईमान,
समझती रही हूँ मैं.
‘बंधुआ-औरत’ बनी,
जन्म से ही घुट्टी
में,
‘परिवार-सेवा-धर्म’
को,
घूँट-घूँट पीती रही
हूँ मैं.
पति-पत्नी के रिश्ते
को,
स्वामी औ दासी के,
रिश्तों में जीती
रही हूँ मैं.
सीता की
लक्ष्मण-रेखा का,
उदाहरण सुन-सुनकर
सदैव सहमती रही हूँ
मैं.
गृह-लक्ष्मी,अन्नपूर्णा
के
तमगे पहने,महानता के
चोगों में
सजती-संवरती रही हूँ
मैं.
लेकिन अब मैंने,
अपनी यह घुट्टी,
आज की बेटियों से
रख दी है छिपाकर.
दूर ही रखा है
उन्हें,
पाबंदी के अहसास से,
चौखट की.
आज वह अपने पैरों
से,
चौखट उलांघ
खुले आसमान में
लेने लगी हैं साँस,
पति उनका स्वामी
नहीं,
जिसकी आज्ञा बिना वे
नहीं उलांघ सकती चौखट.
अब वह उनका मित्र
है,
हमसफ़र है,
है जीवन साथी,
जो आज्ञा नहीं,
सलाह देता है,
सहयोग करता है.
देखती हूँ मैं ,
वे बंधी आज भी हैं,
लेकिन किसी मज़बूरी,
भय से नहीं,
प्यार की डोर से.
वे अपनी चौखट को
भूली नहीं,
उसे सजाती हैं,
पूजती हैं,
पर अपने लिए उन पर
ताले नहीं लगाने
देती हैं.
मैं निहारती हूँ
उन्हें,
अपनी चौखट से
और खुश होती हूँ.
बताती हूँ, उन्हें
चौखट अवरोध नहीं,
एक माध्यम है
हमें आसमान दिखाने
का.
अपने आप को
आतंरिक प्रदूषण से
बचाने का.
मंगलवार, 3 दिसंबर 2013
हथेलियों में सूरज
-हथेलियों में सूरज-
जी चाहता है उगा लूँ,
हथेलियों में अपनी,
एक नन्हा सूरज,
जो जला सके
उन गिद्धई वासना-रत
निगाहों को,
जो ताकती रहती है,
अबोध अहिल्याओं को.
जी चाहता है उगा लूँ,
हथेलियों में अपनी,
एक नन्हा सूरज,
कर सके जो भस्म ,
उन बलात्कारियों को,
जो छिपे हैं आज भी,
सबकी निगाहों से,
और गरज रहे हैं,
शेर बन कर.
जी चाहता है उगा लूँ,
हथेलियों में अपनी,
एक नन्हा सूरज,
जिसकी किरणें समा जाएँ,
कलम में मेरी,
उधेड़ दे जो बखिए,
सिले हुए राज़ो के,
हो जाएँ जिनसे रोशन,
उनके अँधेरे के गुनाह,
जो पाएं हैं पनाह सत्ता की,
कर भस्म उनके आशियानों को,
कर दूं उन्हें,
भटकने को मज़बूर .
जी चाहता है उगा लूँ,
हथेलियों में अपनी,
एक नन्हा सूरज,
कर दूँ भस्म उन,
तथाकथित नेताओं को,
जो नेता कम पिछलग्गू
अधिक आते हैं नज़र,
जो छिपाएं हैं सफेदी में,
अपने कर्मों की कालिख,
और ढा रहे हैं कहर.
नोटों के नशे में धुत्त,
जिनकी कलम तुलती है,
करोड़ों में.
जिनके कालीन के तले,
बिछे होते हैं,
अरबों-खरबों रुपए,
भविष्य को कर सुरक्षित,
सो रहे हैं जो बेखबर.
जी चाहता है उगा लूँ,
हथेलियों में अपनी,
एक नन्हा सूरज,
कर दूँ भस्म,
उन देशद्रोहियों को,
जो देश में आज भी,
घूम रहे हैं ज़िंदा,
कर रहे आतंकित,
जनता को पहन मुखौटा.
जी चाहता है उगा लूँ,
हथेलियों में अपनी,
एक नन्हा सूरज,
जो बनकर आए
एक आशा की किरण
उन हृदयों में
जो आज बुझ चुके हैं,
खो बैठे हैं अपनी आस्था
सत्ता के प्रति
जो लाए एक स्वर्णिम प्रभात,
उन चंद इंसानों के लिए,
जो आज भी सत्य के साए में
ईमानदारी और विश्वास को लपेटे
गठरी बने बैठे हैं,
अपने घरोंदे में.
जी चाहता है उगा लूँ,
हथेलियों में अपनी,
एक नन्हा सूरज,
नहीं खौफ़ तनिक मुझे
अपनी हथेलियाँ जलने का,
राहत ही मिलेगी तब,
कर सकूंगी जब कुछ तो,
दिशाहीन,
भटकते समाज को
रोशनी से रु-बरू करवाकर.
-----मंजु महिमा
१/११/२०१३
रविवार, 28 जुलाई 2013
उत्तराखंड-सुप्रभात
जून 2006 में जब हम उत्तराखंड -नैनीताल आदि स्थानों पर भ्रमण हेतु
गए थे, तभी अद्भुत प्राकृतिक दृश्यों को देखकर जो भाव उमड़े, उन्हीं
को
कलम बद्ध कर रहीं हूँ यहाँ.
-हायकु-
हिम श्रृंखला,
फैलीं रवि रश्मियाँ,
हेम सदृष्य.
(6-6-2006)
नैनीताल झील के चार
प्रहर
-प्रात:काल-
मधुर निद्रा में
मुस्काती.
अल्हड कन्या सी,
तैर रही जिसकी,
झील सी आंखों में,
रुपहरी स्वपनिल मछलियाँ.
-मध्याह्न-काल –
एक सुघड़ गृहणी सी,
व्यस्त भागती-दौड़ती,
अपने काम निबटाती.
क्षण भर भी नहीं
देख पाती दर्पण,
कर देती है अपना आतिथ्य
अतिथियों को अर्पण .
संध्या-काल-
एक नायिका सी,
भाल पर सिंदूरी टीका,
सूरज का लगाए ,
सुनहरी गोट लगा,
पहन वारिद का परिधान,
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