बस
एक रावण मारने
से
क्या होगा
राम?
यहाँ तो अनेक
रावण
अनेक भेष में,
अनेक मुखौटे
लगाए,
चुरा बैठे
हैं,
सत्य की सीता
को.
कैसे पहचानोगे
उसे?
कैसे सुखा
पाओगे
उसका अमृत
कलश?
पता है
तुम्हें?
अब वह उसकी
नाभि में नहीं,
स्विस बैंक
में है,
बाथरूम की
दीवारों में,
सोफों की
दरारों में,
सागर के रसातल
में,
संतों के
आश्रमों में,
मंदिरों के गर्भ-गृहों में,
अस्पतालों के
थियेटरों में,
शिक्षा के
गलियारों में,
रक्षकों के
हथियारों में,
और भी ना जाने
कहाँ-कहाँ अपनों
में
छुपा बैठा है
|
कौन तुम्हें
बताएगा?
विभीषण भी,
अब डरा-डरा सा
है,
क्योंकि
उसे भी बहुत
बदनाम किया
है,
‘घर का भेदी’
कहकर
लांछित
किया है
दुनिया ने.
पर अब ज़माना
गया है बदल,
अत:
तुम्हें भी अब
अपनी नीति
बदलनी होगी,
पैंतरे बदलने
होंगे.
राम नहीं
बनना होगा
अर्जुन,
और लड़ना होगा,
अन्याय व
भ्रष्टाचार के खिलाफ.
उठाना होगा,
गाण्डीव
अपने ही लोगों
के ऊपर,
जिनमें छुपा
हुआ है,
रावण
और कराना होगा
मुक्त,
सत्य की सीता
को,
उसके
प्रगल्भ जाल
से,
तभी मनेगा
हे राम !
हमारा विजय पर्व...
प्रतीक्षारत ....
तभी मनेगा
हे राम !
हमारा विजय पर्व...
प्रतीक्षारत ....
©----मंजु महिमा
विजय-दशमी पर्व -1988
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