31 जुलाई 2019
महान कथाकार मुंशी प्रेमचंद जी के संग्रहालय लमही में -
आज महान कथाकार मुंशी प्रेमचंद जी के जन्मदिवस पर फिर याद आगईं , सन् 2015 मई में 10 वें अंतरराष्ट्रीय हिंदी सम्मेलन के दौरान गए ' साहित्यकारों का मक्का' माने जाने वाली प्रेम चंद जी की जन्म स्थली ' लमही ' की। बनारस से करीब आधे घंटे की दूरी पर ही है, यह साहित्यिक तीर्थ, जहाँ पर ईदगाह ,दो बैलों की जोड़ी, गोदान आदि जैसी कालजयी कहानियों और उपन्यासों के रचयिता का जन्म हुआ था। अब सरकार ने मुंशी प्रेमचंद की इस जन्म स्थली का स्मारक बना दिया है। सड़क से थोड़ा हटकर ही एक प्रवेश द्वार बना है, बाहर एक चौपाल पर गाय-बैल मिट्टी के बिठाए हैं, जो सजीव व स्वभाविक लगते हैं। दल के सभी लोग बस के रुकते ही फटाफट ऐसे उतरे और अंदर की ओर चल पडे, जैसे स्वयं प्रेमचंद जी ही हमारा इंतज़ार कर रहे हों
प्रवेश द्वार में प्रवेश करते ही हमें उनके दर्शन होगए यानि कि मूर्ति के और सहजता से ही हम नतमस्तक होगए।
महान कथाकार मुंशी प्रेमचंद जी के संग्रहालय लमही में -
आज महान कथाकार मुंशी प्रेमचंद जी के जन्मदिवस पर फिर याद आगईं , सन् 2015 मई में 10 वें अंतरराष्ट्रीय हिंदी सम्मेलन के दौरान गए ' साहित्यकारों का मक्का' माने जाने वाली प्रेम चंद जी की जन्म स्थली ' लमही ' की। बनारस से करीब आधे घंटे की दूरी पर ही है, यह साहित्यिक तीर्थ, जहाँ पर ईदगाह ,दो बैलों की जोड़ी, गोदान आदि जैसी कालजयी कहानियों और उपन्यासों के रचयिता का जन्म हुआ था। अब सरकार ने मुंशी प्रेमचंद की इस जन्म स्थली का स्मारक बना दिया है। सड़क से थोड़ा हटकर ही एक प्रवेश द्वार बना है, बाहर एक चौपाल पर गाय-बैल मिट्टी के बिठाए हैं, जो सजीव व स्वभाविक लगते हैं। दल के सभी लोग बस के रुकते ही फटाफट ऐसे उतरे और अंदर की ओर चल पडे, जैसे स्वयं प्रेमचंद जी ही हमारा इंतज़ार कर रहे हों
हाँ, हमारा इन्तज़ार अवश्य हो रहा था, करने वाले थे- प्रेमचंद जी के प्रपौत्र श्री विजय राय जी और उनकी माताजी। आयोजकों ने मुंशी प्रेमचन्द जी की मूर्ति के पीछे हमारे सम्मेलन का बैनर लगाया और कार्यक्रम डा. रंजना अरगड़े जी की अध्यक्षता और आ.गिरीश पंकज ,श्री प्रेम जन्मेजय और श्री विजय राय जी मुख्य अतिथि की उपस्थिति में आरंभ किया| मुंशी प्रेमचन्द की मूर्ति पर हम सभी ने बडी़ श्रृद्धा से माल्यार्पण किया और उनसे आशीर्वाद चाहा। हमारे साथ सभी प्रसिद्ध और वरिष्ठ साहित्यकार थे और सभी की भिन्न भिन्न प्रतिक्रिया थीं। लोगों ने श्रद्धापूर्वक प्रेमचंद जी का स्मरण उनके साहित्यिक अवदान को याद करते हुए किया | इस अवसर पर लमही से लुम्बिनी पत्रिका का लोकार्पण किया गया और प्रेमचंद जी की स्मृति और साहित्यिक धरोहर को अक्षुण्य रखने के लिए आदरणीय विजय राय जी का एक दर्जन से अधिक संस्थाओं द्वारा सम्मान किया गया | मैंने भी अपनी सद्य प्रकाशित पुस्तक 'हथेलियों में सूरज' विजय राय जी को भेंट की।
मुंशी प्रेमचंद जी का वह कक्ष भी देखा जहाँ वे बैठकर लिखा करते थे , जहाँ उनका हुक्का, उनकी मेज, लालटेन सभी आज भी देखे जा सकते है | उन्हें यथावत अवस्था में देख हम चकित थे, ऐसा लग रहा था कि लेखक श्री किसी कार्य से बाहर गए हैं और आने वाले हैं। मेरे हाथों में कुछ सरसराहट सी होने लगी थी, सोच रही थी कि आसपास कोई कपड़ा मिल जाए तो... पुस्तकों की धूल झाड़ दूं. विजय राय जी ने स्वागत भाषण में सरकारी बेरूखी को बयान किया जिससे हमारे मन में उठे सवालों का निराकरण तो हुआ पर मन क्षुभित हुआ। प्रेमचंद जी का जीवन जीते जी तो तंगी में बीता ही था, पर मृत्यु उपरांत भी उनकी मूर्ति को, उनके अध्ययन कक्ष को भी उसी मुफ़लिसी में देख लेखक की दुर्दशा पर दुखी होना स्वाभाविक था, पर तभी कैमरों की बत्तियां जल गईं और सब बारी- बारी से कैमरे के सामने मूर्ति के साथ ऐसे खड़े होने लगे जैसे प्रेमचंद जी के साथ ही खडे़ हों।
मेरे लिए तो विशेष गर्व की बात यह रही कि वे भी कायस्थ ही थे। उनका असली नाम धनपत राय श्रीवास्तव था। यूँ तो मैने बहुत से चित्र लिए जो वहाँ की भित्ति पर उकेरे हुए उनकी कहानियों के पात्रों के थे, जिन्हें देखकर काफ़ी अनुमान लगाए जा सकते हैं. अभी तो इस महान लेखक को जो अमर हैं, मेरी आत्मिक श्रृद्धांजलि अर्पित है। ईश्वर से कामना है कि उन्हें असीम शांति प्रदान करें जिससे वे पृथ्वी पर न झांक सकें। आमीन, ओम शांति






मुंशी प्रेमचंद जी का वह कक्ष भी देखा जहाँ वे बैठकर लिखा करते थे , जहाँ उनका हुक्का, उनकी मेज, लालटेन सभी आज भी देखे जा सकते है | उन्हें यथावत अवस्था में देख हम चकित थे, ऐसा लग रहा था कि लेखक श्री किसी कार्य से बाहर गए हैं और आने वाले हैं। मेरे हाथों में कुछ सरसराहट सी होने लगी थी, सोच रही थी कि आसपास कोई कपड़ा मिल जाए तो... पुस्तकों की धूल झाड़ दूं. विजय राय जी ने स्वागत भाषण में सरकारी बेरूखी को बयान किया जिससे हमारे मन में उठे सवालों का निराकरण तो हुआ पर मन क्षुभित हुआ। प्रेमचंद जी का जीवन जीते जी तो तंगी में बीता ही था, पर मृत्यु उपरांत भी उनकी मूर्ति को, उनके अध्ययन कक्ष को भी उसी मुफ़लिसी में देख लेखक की दुर्दशा पर दुखी होना स्वाभाविक था, पर तभी कैमरों की बत्तियां जल गईं और सब बारी- बारी से कैमरे के सामने मूर्ति के साथ ऐसे खड़े होने लगे जैसे प्रेमचंद जी के साथ ही खडे़ हों।
मेरे लिए तो विशेष गर्व की बात यह रही कि वे भी कायस्थ ही थे। उनका असली नाम धनपत राय श्रीवास्तव था। यूँ तो मैने बहुत से चित्र लिए जो वहाँ की भित्ति पर उकेरे हुए उनकी कहानियों के पात्रों के थे, जिन्हें देखकर काफ़ी अनुमान लगाए जा सकते हैं. अभी तो इस महान लेखक को जो अमर हैं, मेरी आत्मिक श्रृद्धांजलि अर्पित है। ईश्वर से कामना है कि उन्हें असीम शांति प्रदान करें जिससे वे पृथ्वी पर न झांक सकें। आमीन, ओम शांति



















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