शुक्रवार, 19 जुलाई 2019

सारनाथ की सैर



                   सन 2015 में नेपाल के लुम्बिनी में आयोजित दसवें अंतरराष्ट्रीय हिन्दी सम्मेलन में हम साहित्यकार भाग लेने गए थे. वहां जाने के लिए हम पहले वाराणासी गए और वहीँ सभी भारत के कोने-कोने से साहित्यकार एकत्र हुए. वहां से बस के द्वारा पहले हम सारनाथ गए थे.  ऐसी मान्यता बताई जाती है कि लुम्बिनी(नेपाल) जो गौतम बुद्ध की जन्मस्थली है, की यात्रा जब तक पूरी नहीं मानी जाती तब तक कि सारनाथ (भारत) की यात्रा नहीं कर लेते. यह वह स्थान है, जहाँ गौतम बुद्ध ने ज्ञान प्राप्त करने के बाद अपना प्रथम उपदेश दिया था. आइए जानते हैं सारनाथ का इतिहास और मान्यताओं के बारे में. 

          
             काशी अथवा वाराणसी से लगभग 10 कि.मी. दूर स्थित सारनाथ प्रसिद्ध बौद्ध तीर्थ है। पहले यहाँ घना वन हुआ करता था और सारंग (मृग) -विहार किया करते थे। उस समय इसका नाम 'ऋषिपत्तन मृगदाय' था। ज्ञान प्राप्त करने के बाद गौतम बुद्ध ने अपना प्रथम उपदेश यहीं पर दिया था। उन्होंने कौडिन्य आदि अपने पूर्व साथियों को प्रथम बार प्रवचन सुनाकर अपने नये मत में दीक्षित किया था। इसी प्रथम प्रवचन को उन्होंने ‘धर्मचक्रप्रवर्तन’ कहा जो कालांतर में, भारतीय मूर्तिकला के क्षेत्र में सारनाथ का प्रतीक माना गया। बुद्ध ही के जीवनकाल में काशी के श्रेष्टी नंदी ने ऋषिपत्तन में एक बौद्ध विहार बनवाया था। 
           इस परिसर में पहुंचकर एक असीम अलौकिकता का अहसास होता है, मुख्यद्वार में प्रवेश करते ही भगवान् बुद्ध की विशालकाय मूर्ति के दर्शन होते हैं, परिसर में चारों ओर हरियाली और अगाध शांति पसरी हुई नज़र आती है.
      

      सम्राट अशोक के समय में यहाँ बहुत से निर्माण-कार्य हुए। आपकी जानकारी के लिए बता दूं कि  शेरों की मूर्ति वाला भारत का राजचिह्न सारनाथ के अशोक के स्तंभ के शीर्ष से ही लिया गया है, जिसे अशोक महान ने वर्ष 250 ईसा पूर्व में बनवाया था। सारनाथ का स्तंभ ही अशोक स्तंभ के नाम से जाना जाता है। सारनाथ स्थित स्तंभ के शीर्ष पर चार शेर बैठे हैं और सभी की पीठ एक दूसरे से सटी हुई है। सारनाथ के अशोक स्तंभ को भारत ने राष्ट्रीय प्रतीक के रुप में अपनाया है। इसके अलावा अशोक स्तंभ के निचले भाग में स्थित चक्र को भारतीय तिरंगे के मध्य भाग में रखा गया है।  मूल  अशोक स्तंभ सारनाथ संग्रहालय (Sarnath Museum) में रखा गया है। अशोक स्तंभ पर तीन लेख लिखे गए हैं जिनमें से पहला लेख अशोक के ही समय का है और ब्राह्मी लिपि में लिखा गया है। जबकि दूसरा लेख कुषाण काल एवं तीसरा लेख गुप्त काल का है।
       यहाँ का ' धम्मेक  अथवा  धमेख स्तूप सारनाथ की प्राचीनता का आज भी बोध कराता है।  इसे ईसा पूर्व - वर्ष 249 में सम्राट अशोक ने बनवाया था।
 
 धम्मेक स्तूप के साथ यह 50 मीटर लंबा स्तंभ अशोक द्वारा बौद्ध धर्म के लिए का उपहार है। धम्मेक स्तूप बौद्धों के लिए एक महत्वपूर्ण स्थल है, यहाँ पर भगवान बुद्ध ने पहली बार अपने पाठों का प्रचार किया था।  इसलिए इस स्थान का महत्त्व बौद्ध-भिक्षुओं के लिए बहुत ही अधिक था, लेकिन विदेशी आक्रमणों और परस्पर धर्मों की धार्मिक खींचातानी के कारण कालांतर में चलकर सारनाथ का महत्व कम हो गया था।                                          
 मृगदाय में सारंगों की संख्या बहुत होने के कारण सारंगनाथ महादेव की मूर्ति की स्थापना हुई और स्थान का नाम सारनाथ पड़ गया।
       थाई मंदिर सारनाथ में एक प्रसिद्ध आकर्षण का केंद्र है, जो यहां की वास्तुकला की शैली को प्रदर्शित करता है। यह मंदिर सुंदर बगीचों के बीच बना हुआ है, जो यहां आने वाले पर्यटकों और तीर्थयात्रियो का  चुम्बकीय  आकर्षण बन गया  है. यह मंदिर स्वर्ण-मूर्तियों से सज्जित है. यहां पर बौद्ध भिक्षुओं द्वारा शांत और शांतिपूर्ण वातावरण सृजित किया गया है। 

          
                    चौखंडी स्तूप को पूरे उत्तर प्रदेश के सभी पवित्र तीर्थ स्थलों में सबसे अधिक पवित्र और पर्यटकों द्वारा सबसे ज्यादा देखा जाने वाला स्तूप बताया जाता है। चौखंडी स्तूप को बौद्ध संस्कृति के सबसे दिव्य और महत्वपूर्ण स्मारकों में से एक बताया जाता है। इस स्तूप का निर्माण ठीक उसी जगह पर किया गया है, जहाँ महान भगवान बुद्ध की मुलाकात अपने पांच तपस्वियों से हुई थी। इन पांच तपस्वियों के द्वारा बुद्ध ने अपनी पहली शिक्षाओं का प्रचार किया। इस प्रमुख घटना के स्मरणोत्सव के रूप में यहां स्मारक का निर्माण किया गया है, जो बौद्ध धर्म के उदय में काफी सहायक रहा। अगर आप इस जगह पर जायेंगे तो यहां चारों ओर से बहती हुई गर्म हवा में भी आपको स्मारक की दिव्यता और शीतलता महसूस होगी। चौखंडी स्तूप जाने के बाद पर्यटकों को एक अलग ही शांति की प्राप्ति होती जो बेहद अद्भुत है। 


             मूलगन्धकुटी विहारये वही टूटा मंदिर है, जिस जगह है, जहाँ बुद्ध ने अपनी पहली वर्षा ऋतु देखी थी।

                  
              सन 1910 में स्थापित पुरातत्व संग्रहालय तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व से 12 वीं शताब्दी ईस्वी तक के कलाकृतियों के संग्रह का प्रदर्शन करता है। अगर आप सारनाथ की यात्रा करने आते हैं तो इस संग्रहालय में रखी हुई प्राचीन कलाकृतियों देखने जरूर जाएं ।
               अब तक तो हमने विभिन्न मनुष्यों और वस्तुओं को ही दूसरे देशों में स्थान्तरित होते हुए सुना था, पर यह बौद्धधर्म जिसका प्रारम्भ भारत से हुआ और आज यह दूसरे देशों में जाकर उनकी धरोहर बन गया है, उनकी असीम आस्था और निष्ठा का प्रतीक बन एशिया के कई बड़े देशों में रच- बस गया है.
                चिलचिलाती धूप में वहाँ घूमना तपोवन का अहसास दिला रहा था... पर शांत रूप से खड़ी भगवान बौद्ध की विशालतम प्रतिमा को देख उनकी महानता और अपनी लघुता और दुर्बलता का भी अहसास हो रहा था.
                 ...वहाँ के कुछ स्मृति-चिह्न जो कैमरे में कैद होगए है, जिन्हें मैं इस लेख के साथ आप सबसे साझा कर आज़ाद कर रही हूँ . 

                     इतना सब जानने के बाद हमारी 
आध्यात्मिक यात्रा, अब साहित्यिक यात्रा बन सारनाथ से चल पड़ी लमही की ओर जो सुप्रसिद्ध लेखक मुंशी प्रेमचद जी का निवास स्थान रहा है.
© मंजु महिमा


कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें