शुक्रवार, 7 सितंबर 2018

जन्मदिन: मनमानी का एक दिन (संस्मरण)


संस्मरण – बाल-मन
बचपन का एक जन्मदिन / एक दिन मनमानी का—
30 जुलाई -
          आज ही के दिन जब अपने नानाजी के पुस्तकालय-कक्ष की धरती पर अपने शिशु-नयन खोले थे, तब कहाँ पता था कि यही किताबें मेरी हमजोली, हमदम , हमसफ़र बन जाएंगी और मेरे हाथों को कलम पकड़ने के लिए विवश कर देंगी. यूं तो जन्मदिन के संस्मरण लिखना शुरू करूँ तो सत्तर  हो जाएंगे, पर  आज याद आ रहा है उम्र की नई देहलीज़ पर लिया अपना कदम –वादा मनमानी का...जिसमें घड़ी का कोई अस्तित्व ना हो---
            यूं तो मेरा बचपन बहुत ही सुखी रहा, घर के सभी बुजुर्गों की भरपूर देखभाल, प्यार-दुलार सभी कुछ था, पर सभी घड़ी  की चाल के साथ, लेकिन यहाँ जो मन में एक बन्दर बैठा था, वह घड़ी  के साथ चलने के लिए हमेशा इनकार करता था (करता था क्या अब भी करता है.. ) उसे यह घड़ी  दुश्मन नज़र आती थी. हाथ में ली किताब तब तक नहीं छूटती थी, जब तक की पूरी नहीं हो जाती, और यहीं आकर घड़ी की टन-टन दुखी करती थी.            
           घर में इकलौती बेटी होने के कारण सबकी निगाह में रहती, यूं कहिए कि सबकी दिनचर्या का सबसे बड़ा हिस्सा मैं ही थी. सुबह होते ही मीठी-मीठी नींद में तोते सी आवाजें सुनाई पड़ती..’ उठ बेटा! इतने बज गए हैं, धूप सर पर चढ़ आई है, स्कूल में देर हो जाएगी..दूध ठंडा हो रहा है, नाश्ता ठंडा हो रहा है..अब नहाने का समय, स्कूल का समय होगया है..... अब पढ़ने का समय...अब खाने का समय...सोने का समय...यानि कि हर काम का समय ही समय... यह घड़ी बड़े मज़े से टकटकाती रहती और घरवाले अपना राग अलापते रहते..मुझे इस पर बहुत गुस्सा आता लगता जैसे इसका पेंडुलम हिल-हिलकर मुझे चिढ़ा रहा है. -उफ़! यह घड़ी  खराब क्यों नहीं हो जाती..चलना ही बंद हो जाए तो आफ़त मिटे...कभी लगता इसकी चाबी किसी दिन चम्बल नदी में ही फेंक आऊँ.. (हमारे पहले के ज़माने में पेंडुलम वाली घड़ियाँ होती थीं जो हर आधे घंटे और एक घंटे पर टनटन करती थीं और उन घड़ियों में रोज चाबी देनी पड़ती थी) भला यह भी कोई बात हुई, मैं अपनी मर्जी से तो कुछ कर ही नहीं सकती..और जब भी करती तो मेरा दिन डांट से शुरू होता और डांट से ही ख़त्म होता.
            एक दिन परेशान होकर मैंने सहमते सहमते अपनी मम्मी को रोते हुए यह बात बता ही दी. सुनकर वे खूब हँसी और कुछ सोचकर कहने लगीं, ‘अच्छा! ऐसा करते हैं, कि तुम्हारा जन्मदिन आ रहा है, वह दिन पूरा तुम्हारा ही होगा. उस दिन तुम जो चाहो वह कर सकती हो, उस दिन कोई भी तुम्हें कुछ भी करने को नहीं कहेगा और ना ही कोई डांटेगा, नाही कोई टोकेगा.’  वाह! उस दिन ऐसा लगा कि मुझे बहुत बड़ा वरदान भगवान् से मिल गया हो...खुशी का ठिकाना न रहा..दिल बल्लियों उछलने लगा. दिमाग सोचने लगा कि ऐसा क्या-क्या किया जाए ...
         जन्मदिन के इंतज़ार में मैंने अपनी योजनाएं बनानी शुरू कर दीं..मैंने वही करने की सोची जिन पर बंदिश थीं, खाने की लिस्ट में भी वही चीजें रखीं, जिन्हें सेहत के लिए हानिकारक समझकर खाने नहीं दिया जाता था...जन्मदिन से एक दिन पहले मम्मी से परिवार में एलान करवा दिया कि जन्मदिन पर मुझे कोई बिल्कुल नहीं टोकेगा और न ही डांटेगा और सुबह भी नहीं उठाएगा.
           मेरी नानी जी कहने लगीं, ‘बेटा! जन्मदिन जीवन का बहुत महत्वपूर्ण दिन होता है, इस दिन हम जैसे रहते हैं, वैसे ही सारा साल निकलता है. इसलिए इस दिन सब अच्छे-अच्छे काम करने चाहिए जैसे- सुबह जल्दी उठना, नहा-धोकर भगवान् और सभी बड़ों का आशीर्वाद लेना, मंदिर जाकर दान-पुण्य करना, स्कूल जाकर अपने सभी शिक्षकों से आशीर्वाद लेना आदि—आदि...
             उनकी ज्ञान भरी बातें सुनकर मुझे अपना वरदान खोता हुआ नज़र आया..पर मैं भी अपनी सोच पर डटी हुई थी, मैंने उनसे कहा, ‘ नहीं नहीं..मैं ऐसा कभी नहीं करुँगी..फिर जन्मदिन का क्या फायदा? सुबह आप मुझे बिलकुल मत जगाना, मैं खूब देर तक सोना चाहती हूँ, इस दिन मुझे अपनी मनमानी करने का पूरा हक़ है..मम्मी ने बोल दिया है..’ बिचारी नानी चुप होगईं, ‘जैसी तुम्हारी मर्जी’,कहकर करवट लेकर सोगईं.
              नानी जी के खर्राटों के बीच मैंने जाग-जागकर कई सपने देख डाले... स्कूल की भी छुट्टी रखूँगी.... खूब देर से उठूंगी,  फिर अपनी प्रिय जगह बगीची में जाउंगी, वहां फव्वारे चलाऊँगी, पानी से खूब खेलूंगी, अपने दोस्त पेड़ों पर चढूँगी, फूलों से बातें करूंगी, तितलियाँ पकड़ूंगी, फिर कुछ खा-पीकर अपनी सहेलियों को बुलाकर आँख-मिचौली, पगतिया आदि खेल खेलूंगी, हम लोग छोटी किराए की साइकिल लेकर पार्क में जाएंगे, वहां कचौरी-चाट, ढेर सारे गोलगप्पे/ पानी पूरी खाएंगे..और आते समय आइसक्रीम खाना तो बिलकुल नहीं भूलना है.. नन्हे दिमाग में आ रही बड़ी-बड़ी बातों के बोझ से कब आँखें बंद होगई..कुछ पता नहीं चला...
            सुबह के शीतल हवा के झोंको के साथ मीठी-मीठी नींद में सपने चल रहे थे..मैं गुलाबी घेर वाली फ्राक पहने परियों के साथ नाच रही थी..कोई मधुर धुन चल रही थी कि अचानक उस धुन के स्थान पर मन्त्र सुनाई देने लगे...मैं इधर-उधर भागकर देखने लगी कि यह आवाज़ कहाँ से सुनाई दे रही है..देखा एक बहुत सुन्दर सा सोने का पिंजरा है उसमें एक व्यक्ति खड़ा है...और जोर-जोर से मन्त्र पढ़ रहा है..मैं उस व्यक्ति को देखने के लिए उस पिंजरे में जैसे ही घुसी कि मेरी आँख खुल गई और आवाज़ से पहचाना कि हमारे परिवार के पंडित जी हर वर्ष की भाँती मेरे जन्मदिन पर आशीर्वचन पढ़ने आएं हैं. क्या करूं? सोई रहूं या उठ जाऊं? बाहर बारिश हो रही थी..ऐसे मौसम में कोई उठता है भला ...ओढ़कर सोने में बहुत मज़ा आ रहा था...पर फिर दिमाग ने कहा..यह पंडित जी इतनी बारिश में भी काफी दूर से पैदल चल कर आशीर्वचन देने आएं हैं..क्या उनके साथ ऐसा सलूक करना अच्छा होगा?
                   मैं अपनी ‘दोहड़’/ रजाई छोड़ झटके से उठी और भागी बाथरूम की ओर ...जल्दी से पानी डाला और नहा-धोकर बाहर निकली अलमारी खोली तो सच ही गुलाबी फ्राक लटकी देख मैं दंग रह गई..मम्मी ने शायद रात को ही लाकर रख दी थी, मुझे चौंकाने के लिए..मैंने जल्दी से पहनी और कमरे से बाहर आई तो नानी जी पंडित जी से कह रहीं थी, ‘ बच्ची अभी सोई हुई है, आप यह सब (मंत्रित फूल, पत्ते, कुमकुम और रक्षा-सूत्र) रख दीजिए, वह उठेगी तो उस पर ‘वार’ दूंगी क्या करें आजकल के बच्चे हैं. तभी मुझे देख चकित सी खुश होकर कहने लगीं, ‘अरे! आजा..आजा..पंडित जी से यह रक्षा-सूत्र बंधवा ले...वाह! हमारी गुड़िया नहा भी ली!! ‘ पंडित जी मेरे सर पर फूल छुआकर फिर से मन्त्र पढ़ने लगे.....हलवा बनने की  सुगंध मेरे नथुनों को सहला रही थी...पंडित जी का आशीर्वाद लेने के लिए जैसे ही झुकी...लगा सारी कायनात बारीश के रूप में मुझे ही आशीर्वाद दे रही है...सभी ने लाड़ लड़ाकर मेरे हाथों में रुपये थमा दिए और लम्बी उम्र और सुखी जीवन की कामना की ...
            मम्मी ने मुस्कुराते हुए पूछा, ‘नाश्ते में हलवे के साथ प्याज़ के पकोड़े खाओगी ना! फिर पापा के साथ मंदिर चलते हैं, वहीँ से स्कूल चले चलेंगे तुम्हारे दोस्तों को मिठाई बांटने... मैंने तुम्हारी प्रिंसीपल से बात कर ली है और आधे दिन की छुट्टी ले ली है...उन्होंने भी तुम्हें हेप्पी बर्थडे कहा है, शाम को पार्टी रखी है, जिसमें गोलगप्पे, समोसे, रसगुल्ले .. आदि आदि रहेंगे ...
यह बताते हुए उन्होंने बड़े प्यार से पूछा, ' क्या यह ठीक रहेगा?’ तभी पापा आए और ‘हेप्पी बर्थडे’ कहते हुए लाड़ लड़ाने लगे और धीरे से जेब से एक सुन्दर सी घड़ी निकाल कर मुझे पहना दी...
   
             वह ज़माना ही कुछ ऐसा था, जिसमें बच्चों का जन्मदिन आजकल की तरह केक काटकर नहीं मनाया जाता था और लड़कियों का तो जन्मदिन ही नहीं मनाया जाता था. इस बारे में मैं अपने आपको बहुत ही सौभाग्यशाली मानती हूँ कि मुझे ऐसा परिवार मिला जो लड़की और लड़के में कोई अंतर नहीं करता था.
              मैं सोचने लगी ...कि...इतने सारे शुभेच्छुकों के रहते तो शायद मैं अपनी मनमानी नहीं कर पाऊँगी और ना ही घड़ी को बंद कर पाऊँगी ... भगवान् वरदान दे दे तब भी...नहीं..... हा...... हा.....क्योंकि अब ये हाथ में जो बंध गई थी.  मेरी मनमानी तो बिचारी धरी की धरी रह गई......    वैसे भी अपनी मनमानी से अधिक आनंद मुझे उस दिन बिन चाहे ही मिल गया था. 
                  बड़े होकर समझ आया समय के साथ चलने का क्या महत्त्व है .. और  साथ न चल पाने पर कई बार कदम-कदम पर कुछ ना कुछ खोना ही पड़ता है ..
                                    © मंजु महिमा



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